CG: अवकाश को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मातृत्व अवकाश महिलाओं का संवैधानिक अधिकार, गर्भपात के बाद भी मिलेगा पूरा लाभ

 CG: अवकाश को लेकर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मातृत्व अवकाश महिलाओं का संवैधानिक अधिकार, गर्भपात के बाद भी मिलेगा पूरा लाभ  


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित हाईकोर्ट ने मातृत्व अवकाश से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को और मजबूती दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि महिलाओं का संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है, जिसे किसी भी स्थिति में सामान्य छुट्टियों के खाते से जोड़कर सीमित नहीं किया जा सकता। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत मिलने वाला अवकाश पूर्णतः अलग प्रकृति का है और इसे सेवा नियमों में उपलब्ध सामान्य अवकाश बैलेंस से प्रभावित नहीं किया जा सकता।

गर्भपात से लेकर दोबारा गर्भधारण तक की कानूनी लड़ाई  

यह मामला भारतीय खाद्य निगम, रायपुर में असिस्टेंट ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत एक महिला कर्मचारी से जुड़ा है। वर्ष 2019 में वह जुड़वां गर्भ से थी, लेकिन गंभीर चिकित्सीय जटिलताओं के कारण 25 अप्रैल 2019 को उनका एक भ्रूण गर्भपात का शिकार हो गया। इसके बाद चिकित्सकीय निगरानी में रहते हुए उन्होंने 3 सितंबर 2019 को एक प्रीमैच्योर बच्ची को जन्म दिया। इस दौरान उन्होंने नियमों के तहत मातृत्व अवकाश और चिकित्सा खर्चों के भुगतान के लिए आवेदन किया, लेकिन विभाग ने केवल 68 दिनों का बिना वेतन असाधारण अवकाश मंजूर किया और यह तर्क दिया कि उनके अवकाश खाते में बैलेंस नहीं है। इसी आधार पर उनके वेतन से 80,254 रुपये की रिकवरी भी कर ली गई, जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

मातृत्व लाभ अधिकार है, दया नहीं  

अदालत ने सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता महिला को मातृत्व अवकाश के तहत निर्धारित 90 दिनों का पूर्ण लाभ मिलना चाहिए था। कोर्ट ने विभाग द्वारा की गई 80,254 रुपये की वसूली को अवैध करार देते हुए उसे वापस करने का आदेश दिया। साथ ही यह भी निर्देश दिया कि महिला के लंबित चिकित्सा बिलों (लगभग 3.76 लाख रुपये) का पुनः दस्तावेजों के आधार पर परीक्षण कर उचित भुगतान सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि मातृत्व लाभ महिलाओं के सम्मान, स्वास्थ्य और मातृत्व सुरक्षा से जुड़ा मौलिक अधिकार है, जिसे किसी तकनीकी या प्रशासनिक कारण से सीमित नहीं किया जा सकता।

महिलाओं के अधिकारों को मिली नई मजबूती  

यह फैसला न केवल संबंधित महिला कर्मचारी के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह पूरे देश में कार्यरत महिलाओं के लिए एक मजबूत संदेश भी है कि मातृत्व केवल व्यक्तिगत स्थिति नहीं बल्कि कानूनी सुरक्षा के दायरे में आने वाला अधिकार है। कोर्ट का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नज़ीर बन सकता है, जिससे प्रशासनिक विभागों को भी अपने नियमों की पुनः समीक्षा करने की आवश्यकता महसूस होगी।

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