छत्तीसगढ़ में नए मेडिकल कॉलेजों पर संकट: 175 पदों के लिए सिर्फ 9 डॉक्टर, रायपुर में लगातार इस्तीफों से बढ़ी चिंता
छत्तीसगढ़ में नए मेडिकल कॉलेजों की शुरुआत से पहले ही फैकल्टी की भारी कमी सामने आ गई है। राज्य में 5 नए मेडिकल कॉलेजों के लिए कुल 175 डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया के तहत वॉक-इन इंटरव्यू आयोजित किया गया, लेकिन स्थिति चौंकाने वाली रही। इन पदों के लिए केवल 9 डॉक्टर ही इंटरव्यू में पहुंचे। चयन प्रक्रिया के बाद इनमें से 8 डॉक्टरों को ही नियुक्ति दी गई। इतनी कम भागीदारी ने स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नए मेडिकल कॉलेजों की योजना और तैयारी
प्रदेश में कवर्धा, जांजगीर-चांपा, मनेंद्रगढ़, कुनकुरी (जशपुर) और गीदम (दंतेवाड़ा) में नए मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना है। चिकित्सा शिक्षा विभाग ने इन कॉलेजों के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) को आवेदन भी भेज दिया है। हालांकि, मान्यता मिलने के लिए केवल आवेदन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि फैकल्टी, अस्पताल इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य सुविधाओं की उपलब्धता भी जरूरी होती है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती डॉक्टरों की उपलब्धता बनकर सामने आई है।
रायपुर मेडिकल कॉलेज से भी लगातार पलायन
जहां एक तरफ नए कॉलेजों के लिए डॉक्टर नहीं मिल रहे, वहीं पुराने और स्थापित संस्थानों से भी डॉक्टरों का जाना जारी है। पं. जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज रायपुर से हाल ही में 5 डॉक्टरों ने नौकरी छोड़ दी है। इनमें तीन रेगुलर और दो संविदा डॉक्टर शामिल हैं। मेडिसिन विभाग के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन दिया है और वे सितंबर तक सेवाएं देंगे। इसके अलावा कुछ डॉक्टरों ने निजी संस्थानों और अन्य सरकारी संस्थानों का रुख किया है।
वेतन, प्रमोशन और असंतोष बना बड़ा कारण
डॉक्टरों के नौकरी छोड़ने के पीछे कई कारण सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा वेतन संरचना और प्रमोशन की धीमी प्रक्रिया है। संविदा और रेगुलर डॉक्टरों के बीच वेतन में असमानता भी नाराजगी का कारण बनी हुई है। इसके अलावा कई वर्षों से प्रोबेशन पीरियड खत्म न होना और प्रमोशन में देरी ने भी असंतोष बढ़ाया है। सुपर स्पेशलिटी डॉक्टरों के लिए अलग कैडर न होने से भी विशेषज्ञ डॉक्टर सरकारी व्यवस्था में टिक नहीं पा रहे हैं।
प्रोबेशन और प्रमोशन पर अटका सिस्टम
प्रदेश के कई मेडिकल कॉलेजों में 80 से अधिक असिस्टेंट प्रोफेसरों का प्रोबेशन पीरियड अब तक समाप्त नहीं किया गया है। वहीं लगभग 296 डॉक्टर प्रमोशन के लिए पात्र होने के बावजूद इंतजार में हैं। असिस्टेंट प्रोफेसर से एसोसिएट प्रोफेसर और फिर प्रोफेसर बनने की प्रक्रिया पीएससी स्तर पर लंबित है। अक्टूबर 2021 में नियुक्त डॉक्टरों का प्रोबेशन पीरियड 2024 में पूरा होना था, लेकिन अभी तक प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है।
प्रशासनिक चुनौतियां और कॉलेज संचालन पर असर
राज्य के 10 मेडिकल कॉलेजों में से 4 कॉलेज प्रभारी डीन के भरोसे चल रहे हैं। वहीं नए बनने वाले कॉलेजों के लिए अभी तक नियमित डीन की नियुक्ति भी नहीं हो पाई है। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर भी गंभीर अस्थिरता बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही फैकल्टी की समस्या हल नहीं की गई, तो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से मान्यता मिलने में भी दिक्कत आ सकती है।
पदों की स्थिति और भविष्य की चुनौती
नए मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसर के 35, एसोसिएट प्रोफेसर के 40, असिस्टेंट प्रोफेसर के 50, सीनियर रेजिडेंट के 25 और जूनियर रेजिडेंट के 25 पद स्वीकृत हैं। लेकिन इन पदों को भरना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। डॉक्टरों के लगातार इस्तीफे, निजी कॉलेजों की ओर रुझान और सरकारी सिस्टम में धीमी प्रगति ने पूरे ढांचे पर दबाव बढ़ा दिया है।
छत्तीसगढ़ में मेडिकल शिक्षा के विस्तार की योजना महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन जमीन पर स्थिति चुनौतीपूर्ण दिख रही है। फैकल्टी की कमी, भर्ती में कम रुचि और डॉक्टरों का लगातार पलायन यह संकेत देता है कि सिर्फ नए कॉलेज खोलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सिस्टम में संरचनात्मक सुधार भी जरूरी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में राज्य की मेडिकल शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।

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