CG: 150 साल पुरानी अंग्रेजों की रोक खत्म! अब महुआ शराब से बदलेगी आदिवासियों की किस्मत

 


रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी समुदायों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए महुआ शराब को कानूनी और व्यावसायिक पहचान देने की तैयारी कर रही है। अंग्रेजों के समय लगाए गए प्रतिबंध को समाप्त करने की दिशा में राज्य सरकार ने अहम पहल शुरू कर दी है। मंत्रालय में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में वन, आबकारी, आदिम जाति कल्याण, विधि, वित्त और राजस्व विभागों ने इस योजना पर सहमति जताई है। अब तैयार प्रस्ताव को कैबिनेट मंजूरी के लिए भेजा जा रहा है।

महिला समूहों को मिलेगा फायदा

नई नीति लागू होने के बाद पंजीकृत सहकारी समितियां और महिला स्व-सहायता समूह महुआ शराब का उत्पादन और बिक्री कर सकेंगे। सरकार की योजना है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ाने के साथ आदिवासी महिलाओं को भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जाए। जिन समूहों में 50 प्रतिशत से ज्यादा महिलाएं होंगी, उन्हें प्राथमिकता देने की तैयारी है।

अंग्रेजों के दौर से लगी थी पाबंदी

महुआ से शराब बनाने और बेचने पर ब्रिटिश शासन के दौरान प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि वर्ष 1970 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आदिवासियों को महुआ संग्रहण का अधिकार दिया था। वर्तमान नियमों के अनुसार पारंपरिक उपयोग के लिए सीमित मात्रा में शराब बनाने की अनुमति है, लेकिन अब इसे व्यवसाय से जोड़कर बड़े स्तर पर आय का जरिया बनाया जाएगा।

महुआ से बढ़ेगी आमदनी

राज्य में फिलहाल महुआ की खरीदी 30 से 34 रुपये प्रति किलो की दर से की जाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक दो किलो महुआ से एक लीटर से ज्यादा गुणवत्ता वाली शराब तैयार हो सकती है। महुआ का उपयोग शरबत, बिस्कुट, लड्डू और औषधीय उत्पाद बनाने में भी किया जाता है। नई नीति से आदिवासी परिवारों की आय में बड़ा इजाफा होने की संभावना है।

फेनी और हेरिटेज की तर्ज पर होगी ब्रांडिंग

सरकार छत्तीसगढ़ की महुआ शराब को विशेष ब्रांड के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। गोवा की फेनी और मध्य प्रदेश के हेरिटेज ब्रांड की तरह इसे बाजार में पहचान दिलाई जाएगी। इसके लिए सरकारी दुकानों के माध्यम से बिक्री नेटवर्क तैयार करने पर भी काम चल रहा है।

विदेशों तक है महुआ की मांग

महुआ आधारित पारंपरिक पेय की मांग केवल देश में ही नहीं, बल्कि यूरोप और अमेरिका जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बढ़ रही है। सरकार का मानना है कि नीति लागू होने के बाद बस्तर और अन्य आदिवासी क्षेत्रों को नई पहचान मिलेगी और स्थानीय लोगों को उनके पारंपरिक संसाधनों का बेहतर लाभ मिल सकेगा।

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