Teejan Bai News: पद्म विभूषण तीजन बाई को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई, पंडवानी की अमर विरासत छोड़ गईं लोकगायिका
रायपुर/दुर्ग।छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली प्रसिद्ध पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत तीजन बाई अब पंचतत्व में विलीन हो गईं। रविवार तड़के करीब 3:15 बजे रायपुर स्थित एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उनका उपचार चल रहा था। उनके निधन से लोककला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है।
राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार
रविवार सुबह उनका पार्थिव शरीर दुर्ग जिले के उनके पैतृक गांव गनियारी लाया गया, जहां हजारों लोगों ने अंतिम दर्शन किए। तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम यात्रा के लिए ले जाया गया। गार्ड ऑफ ऑनर के बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, लोक कलाकार और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।
देशभर से मिली श्रद्धांजलि
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित कई प्रमुख हस्तियों ने तीजन बाई के निधन पर शोक व्यक्त किया। सभी ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति की असाधारण प्रतिनिधि बताते हुए कहा कि उन्होंने अपनी कला के जरिए छत्तीसगढ़ का गौरव दुनिया तक पहुंचाया।
गरीबी से शुरू हुआ सफर, दुनिया तक पहुंची पहचान
8 अगस्त 1956 को दुर्ग जिले के अटारी गांव में जन्मी तीजन बाई का बचपन अभावों में बीता। बचपन में अपने नाना से महाभारत की कथाएं और पंडवानी सुनते-सुनते उनका रुझान इस लोककला की ओर बढ़ा। महज 9 वर्ष की उम्र में उन्होंने प्रशिक्षण शुरू किया और 13 साल की उम्र में पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देकर अपनी अलग पहचान बना ली।
सम्मानों से सजा गौरवशाली जीवन
भारतीय लोककला में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री (1988), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995), पद्म भूषण (2003) और पद्म विभूषण (2019) से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तथा मानद उपाधियां भी प्राप्त हुईं। उनकी दमदार प्रस्तुति ने पंडवानी को देश की सीमाओं से बाहर भी नई पहचान दिलाई।
लोककला की अमिट विरासत
तीजन बाई ने केवल पंडवानी का गायन नहीं किया, बल्कि उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम भी किया। उनकी सशक्त आवाज, अभिनय और प्रस्तुति शैली आने वाले वर्षों तक भारतीय लोक संस्कृति के इतिहास में प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।


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