नक्सलियों को सबसे बड़ा झटका, झीरम जैसे कई हमलों का मास्टरमाइंड हिड़मा मारा गया, जानिए आखिर कौन था हिड़मा...
रायपुर। छत्तीसगढ़ को नक्सल मुक्त बनाने के मिशन को एक बड़ी बढ़त मिली है। सुरक्षा बलों ने देश के सबसे कुख्यात और वांछित माओवादी कमांडर माड़वी हिड़मा को एक भीषण मुठभेड़ में मार गिराया है। हिड़मा पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की प्राथमिक सूची में शामिल था।
यह मुठभेड़ छत्तीसगढ़–आंध्रप्रदेश सीमा के घने जंगलों में हुई, जहां सुरक्षाबलों ने हिड़मा, उसकी पत्नी राजे और चार अन्य नक्सलियों को ढेर कर दिया। इस कार्रवाई के बाद दक्षिण बस्तर के अधिकांश क्षेत्रों में नक्सली नेटवर्क लगभग खत्म होने की स्थिति में बताया जा रहा है, जबकि माड़ क्षेत्र को पूरी तरह नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है।
आखिर कौन था हिड़मा?
साल 1981 में सुकमा जिले के पुवर्ती गांव में जन्मा हिड़मा, CPI (माओवादी) की केंद्रीय समिति का सबसे कम उम्र का सदस्य था। बस्तर क्षेत्र से केंद्रीय समिति में शामिल होने वाला वह एकमात्र आदिवासी नेता भी था। “संतोष” के नाम से भी कुख्यात हिड़मा, PLGA की बटालियन नंबर–1 का कमांडर था—यह वही इकाई है जिसे माओवादी संगठन की सबसे घातक और हमलावर टुकड़ी माना जाता है। सुरक्षा एजेंसियां उस पर कम से कम 26 बड़े हमलों की जिम्मेदारी बताती रही हैं।
चिंतलनार और झीरम: हिड़मा की सबसे खौफनाक वारदातें
2010 का ताड़मेटला हमला
6 अप्रैल 2010 को सुकमा के चिंतलनार कैंप से कुछ दूरी पर सुरक्षाबलों की टीम पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था। यह पूरी योजना हिड़मा की बताई जाती है, जिसमें पेड़ों के पीछे छिपकर नक्सलियों ने जवानों को जाल में फंसाया और भीषण गोलीबारी की। इस मुठभेड़ में बड़ी संख्या में जवान शहीद हुए थे।
2013 का झीरम घाटी हत्याकांड
25 मई 2013 को झीरम घाटी के पास कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए हमले ने पूरे देश को हिला दिया था। इस घटना में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल, और ‘बस्तर टाइगर’ कहलाने वाले महेंद्र कर्मा समेत लगभग 30 लोगों की मौत हो गई थी। इस हमले का मास्टर माइंड भी हिड़मा ही माना जाता है।
परिवार की अपील और हालिया घटनाएँ
10 नवंबर को उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा सुकमा के कोंटा ब्लॉक के अतिसंवेदनशील गांव पुवर्ती पहुंचे थे। यहां आयोजित जनचौपाल में हिड़मा और दूसरे नक्सली बारसे देवा के परिवार वाले भी मौजूद थे।
हिड़मा की मां माड़वी पुंजी ने सार्वजनिक रूप से अपने बेटे से हथियार छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने की अपील की थी। वीडियो जारी कर उन्होंने कहा था कि “जंगल में भटककर किसी का भला नहीं हो रहा… परिवार और गांव छोड़ने से सिर्फ नुकसान हुआ है।”
लेकिन हिड़मा ने आत्मसमर्पण का रास्ता नहीं चुना और अंततः सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया।
नक्सल नेटवर्क पर सबसे भारी चोट
हिड़मा की मौत को सुरक्षा विशेषज्ञ नक्सली संगठन के लिए सबसे बड़ा झटका मान रहे हैं। उसकी रणनीति, उसकी बटालियन और बस्तर के इलाकों पर उसका प्रभाव सालों से सुरक्षाबलों के लिए चुनौती बना हुआ था। अब उसकी मौत के बाद बस्तर का बड़ा हिस्सा नक्सलवाद से लगभग मुक्त होने की ओर बढ़ रहा है।

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