रायपुर। प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में नियुक्तियों और प्रभार वितरण को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप है कि नियमों और वरिष्ठता को दरकिनार कर जूनियर डॉक्टरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं, जबकि कई वरिष्ठ डॉक्टरों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इससे विभाग के भीतर असंतोष का माहौल बनने लगा है।हाल ही में जिला अस्पताल पंडरी में एक विशेषज्ञ डॉक्टर को सिविल सर्जन का प्रभार दिया गया है, जबकि अस्पताल में उनसे काफी वरिष्ठ डॉक्टर मौजूद हैं। जानकारी के मुताबिक, अस्पताल में वर्ष 1983 बैच की वरिष्ठ डॉक्टर को पहले प्रभार सौंपा गया था, लेकिन मात्र 15 दिनों के भीतर उन्हें हटा दिया गया। इसके बाद जूनियर डॉक्टर को जिम्मेदारी मिलने से विभागीय प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
सीएमएचओ कार्यालय में भी लंबे समय से जमे डॉक्टर
इसी तरह सीएमएचओ कार्यालय में भी कई डॉक्टर लंबे समय से अहम शाखाओं का प्रभार संभाले हुए हैं। बताया जा रहा है कि कुछ तदर्थ नियुक्त डॉक्टर पिछले डेढ़ दशक से एक ही जिम्मेदारी पर बने हुए हैं। आयुष्मान भारत योजना और टीबी नियंत्रण जैसे विभागों का संचालन भी ऐसे ही अधिकारियों के पास है। सूत्रों के अनुसार, जिला मलेरिया अधिकारी सहित कई पदों पर वर्षों से एक ही अधिकारियों की तैनाती बनी हुई है। वहीं कम अनुभव वाले डॉक्टरों को भी कई योजनाओं और कार्यक्रमों की जिम्मेदारी सौंपे जाने को लेकर चर्चा तेज है। हाल में जारी आदेशों में कुछ जूनियर मेडिकल अफसरों को शहरी स्वास्थ्य केंद्रों का प्रभार भी दिया गया है।
रायगढ़ में भी ऐसा ही मामला
मामला केवल स्वास्थ्य विभाग तक सीमित नहीं है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत रायगढ़ मेडिकल कॉलेज में भी वरिष्ठता को लेकर विवाद सामने आया है। यहां एक एसोसिएट प्रोफेसर को डीन की जिम्मेदारी दिए जाने पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि कॉलेज में कई वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य कार्यरत हैं।
पदोन्नति प्रकिया लंबित होने का असर
प्रदेश में लंबे समय से पदोन्नति प्रक्रिया लंबित होने का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में नियमित अधीक्षक, सिविल सर्जन और डीन की कमी बनी हुई है। कई संस्थान प्रभारी व्यवस्था के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
अब व्यवस्था को लेकर उठे सवाल
जानकारों का कहना है कि यदि समय पर प्रमोशन प्रक्रिया पूरी की जाए तो मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी की कमी काफी हद तक दूर हो सकती है। खासकर ऐसे समय में जब प्रदेश में नए सरकारी मेडिकल कॉलेज शुरू करने की तैयारी चल रही है, तब अनुभवी डॉक्टरों की पदस्थापना और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल और भी अहम हो जाते हैं।

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